निराला: व्यक्तित्व के कुछ अन्तरंग शब्दचित्र – अजित कुमार

Nirala‘वह सहज विलंबित मंथर गति, जिसको निहार 
गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार…’ 
                                               रामविलास शर्मा 

प्रसिद्द हिंदी लेखक अजित कुमार के साथ ये बातचीत मैंने लंदन में  वर्षों पहले रिकॉर्ड की थी. उनके बचपन में निराला जी उनके घर आया करते थे और जब अजित कुमार इलाहबाद विश्वविद्यालय में पढने गए तो एक बार फिर निराला जी से मिलने का सिलसिला शुरू हुआ। इस बातचीत में वो निराला जी के व्यक्तित्व के विविध आयामों पर प्रकाश डालते हुए, उनके  बिगड़ते मानसिक स्वास्थय का भी ज़िक्र कर रहे है। 

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 1896 में वसंत पंचमी के दिन हुआ था। आपके जन्म की तिथि को लेकर अनेक मत प्रचलित हैं।  निराला जी के कहानी संग्रह ‘लिली’ में उनकी  जन्मतिथि 21 फरवरी 1899 प्रकाशित है। ‘निराला’ अपना जन्म-दिवस वसंत पंचमी को ही मानते थे। आपके पिता पंडित रामसहाय तिवारी उन्नाव के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। ‘निराला’ जी की औपचारिक शिक्षा हाई स्कूल तक हुई। तदुपरांत हिन्दी, संस्कृत तथा बांग्ला का अध्ययन आपने स्वयं किया। तीन वर्ष की बालावस्था में माँ की ममता छीन गई व युवा अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते पिताजी भी साथ छोड़ गए।  प्रथम विश्वयुध्द के बाद फैली महामारी में आपने अपनी पत्नी मनोहरा देवी, चाचा, भाई तथा भाभी को गँवा दिया। विषम परिस्थितियों में भी आपने जीवन से समझौता न करते हुए अपने तरीक़े से ही जीवन जीना बेहतर समझा।

इलाहबाद शहर के दारागंज मुहल्ले में अपने एक मित्र, ‘रायसाहब’ के घर के पीछे बने एक कमरे में 15 अक्टूबर 1971 को आपने अपने प्राण त्याग इस संसार से विदा ली।  ‘निराला’ सचमुच निराले व्यक्तित्व के स्वामी थे। लेकिन अपनी बेटी सरोज के असामयिक निधन और जीवन भर ग़रीबी से संघर्ष करने के कारण जीवन के अंतिम वर्षों में उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया था, जिसका उल्लेख अजित कुमार अपनी इस भेंट वार्ता में कर रहे हैं।


भिक्षुक | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

वह आता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।

पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी-भर दाने को – भूख मिटाने को
मुँह फटी-पुरानी झोली का फैलाता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख होंठ जब जाते
दाता-भाग्य-विधाता से क्या पाते?-
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।

तोड़ती पत्थर | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’todti-pathar

वह तोड़ती पत्‍थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्‍थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्‍वीकार;
श्‍याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
गुरू हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार :-
सामने तरू-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू,
रूई ज्‍यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगी छा गयीं,
प्राय: हुई दुपहर :-
वह तोड़ती पत्‍थर।

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्‍नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्‍यों कहा –
‘मैं तोड़ती पत्‍थर।’

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