दारागंज के ऋषि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

॥ इलाहाबाद की यादें — दारागंज के ऋषि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ॥Nirala
इस बार इलाहाबाद में कुछ घंटे इसलिए निकल आए क्योंकि इलाहाबाद से कोलकाता की कोई फ्लाइट नहीं थी, लिहाज़ा रात की ट्रेन से लौटने का रिज़र्वेशन था। मित्रों का सुझाव था कि इलाहाबाद छोटा सा शहर है और इसे कुछ घंटों में ही देखा जा सकता है। लोग यहाँ आनंद भवन, स्वराज भवन, अकबर का किला, खुसरो बाग और संगम ही तो देखने आते हैं। हाईकोर्ट बगल में है और यूनीवर्सिटी के आगे से हमारी गाड़ी गुज़रेगी ही। पर मैंने कुछ और ही सोच रखा था। आनंद भवन और स्वराज भवन तो नेहरू खानदान की सरकारी धन से पालित संस्थाएं रही हैं अतः उन्हें मैं कतई नहीं देखना चाहता था हालाँकि शायद यूनिवर्सिटी के सामने ही मुझे उनके प्रवेश द्वार भी नज़र आए।

मेरे मन में इच्छा थी कि इस बार निराला और महादेवी की स्मृतियों को मुख्य रूप से इलाहाबाद में खोजा जाए। सुबह सुबह जब मेरे सहयोगी मेरे पास होटल कान्हा श्याम पहुँचे तो उनके साथ पुलिस के एक अधिकारी थे जो थोड़े साहित्य प्रेमी भी थे। उन्होंने बताया की मुझे सबसे पहले संगम चलना चाहिए, जिसके लिए जल पुलिस के मोटर बोट की व्यवस्था की गई है। वहाँ से बाहर निकलते ही लेटे हुए हनुमान जी को प्रणाम करेंगे तो मन की मुराद पूरी हो जाएगी। मैं इस सलाह पर विश्वास करना चाहता था, अतः हम सबसे पहले संगम गए और फिर वहाँ से हनुमान मंदिर। हनुमान जी से कुछ नहीं माँगा, उन्हें क्या परेशान करता।

मंदिर से बाहर आकर गाड़ी के ड्राईवर से पूछा कि क्या आप दारागंज चल सकते हैं? जी, आगे सामने गंगा की तरफ दारागंज ही है, चलिए। दारागंज में प्रवेश करते ही कुछ पढ़े लिखे से दिखने वाले व्यक्तियों से हमने निराला जी के घर का पता पूछा? किसी को निराला जी के विषय में कोई जानकारी नहीं थी। चलते चलते एक गली के सामने बहुत विपन्न अवस्था में बिजली के तारों से अटी एक विवर्ण प्रतिमा दिखाई दी जो निश्चित ही महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की ही थी। उसके आस पास साप्ताहिक बाज़ार के तख्त रखे थे। पास बैठे एक पटरी दुकानदार से पूछा, जिनकी इस प्रतिमा के पास आप बैठे हैं, उनका घर यहीं कहीं था, आप बताएंगे? दुकानदार ने ऊपर से नीचे तक हमें देखा और कहा, हमें क्या पता बाऊजी, ये कौन हैं, बड़े लोग तो सिविल लाइन की तरफ ही रहते होंगे। आप पीछे बैठे बाबाजी से पूछ लो! उनको मालूम होगा।

निराला जी की प्रतिमा के ठीक पीछे एक छोटी सी दुकान दिखाई दी जिसका नाम था निराला इलैक्ट्रिकल्स। बिजली का कुछ कबाड़नुमा सामान भरा था और वहाँ बैठे एक बुज़ुर्ग तल्लीन होकर हिंदी का अखबार पढ़ रहे थे। उन्हें प्रणाम करके फिर अपना सवाल दोहराया। भाग्य से इसबार हम सही जगह पर थे। श्रीमान बुजुर्ग, पंडित कृष्णकांत तिवारी थे जिनकी वय लगभग 80 वर्ष थी और उन्होंने निराली जी को बहुत निकट से देखा था। उस ज़माने में भी यह दुकान थी और वे अपने पिता के साथ यहाँ बैठते थे।
एक गली की तरफ इशारा करके उन्होंने बताया कि इसमें अवस्थी जी के मकान में निराला जी किराए पर रहते थे…. किराया कितनी बार दिया, कोई नहीं बता सकता क्योंकि उनके पास पैसा तो होता ही नहीं था। अब वहाँ निराला जी के कोई अवशेष भी नहीं बचे हैं। मकान को भी तोड़ कर नए सिरे से बना दिया गया है।

उन्होंने बताया कि मैं निराला जी के मकान में एक बार झाँक आया था क्योंकि वह सिर्फ साँकल ही बंद करते थे, ताला शायद उनके पास था ही नहीं। घर में एक तखत था जिस पर कुछ कागज़ और पुस्तकें बिखरी थीं। स्याही की दवात और एक होल्डर। एक पानी का घड़ा। रसोई में चूल्हा और आटे दाल की कुछ पोटलियाँ। सब कुछ अस्त-व्यस्त। बिजली थी नहीं, दिया ही जलाते थे। लालटेन तक नहीं थी उनके पास।

इस मकान में रहते हुए उन्होंने कई पुस्तकें लिखी थीं। मुहल्ले के सभी लोग जानते थे कि वह बहुत बड़े साहित्यकार थे। बीच बीच में वह महीनों गायब हो जाया करते थे। शायद लखनऊ या कलकत्ता जाया करते थे। इस चौक पर उन दिनों कई दूध दही की दुकानें थीं जिन पर रबड़ी और खुरचन बिका करती थी। निराला जी भाँग की गोली लेकर जिस भी दुकान पर जा पहुँचते, दुकानदार उन्हें आदर भाव से दूध और रबड़ी का भोग लगवाते थे। कभी किसी ने उनसे किसी चीज़ के लिए पैसा नहीं माँगा। पूरे मुहल्ले को उनके होने पर गर्व था और धनिक वर्ग के लोग उनके आगे पीछे दौड़ते थे, पर वह किसी को मुँह नहीं लगाते थे।

एक बार किसी सेठ ने अपने बेटे की शादी के लिए उनको सेहरा लिखने को कहा, उन्होंने 100 रुपये नकारते हुए कह दिया हम तो मृत्यु की कविता लिखते हैं, जिसकी आपको ज़रूरत न होगी! वह बेहद स्वाभिमानी और अख्खड़ स्वभाव के थे। जब कभी पैसा मिल भी जाता तो तुरंत उसे ज़रूरतमंदों को बाँट देते थे।

उसका शरीर सौष्ठव देखने के लायक था। गौर वर्ण, छह फीट लम्बे गठीले पुरुष थे जो हल्की दाढ़ी रखते थे। नियमित पूजा पाठ नहीं करते थे लेकिन कभी कभी तिलक इत्यादि धारण करते थे। कर्मकाण्ड को मानते हुए उन्हें नहीं देखा गया।
ताँगे में बैठे किसी ऋषि से भव्य लगते थे। महादेवी जी के अशोकनगर स्थित आवास तक प्रायः पैदल ही जाते थे। उन दिनों इलाहाबाद के अधिकांश साहित्य प्रेमी यह जानते थे कि महादेवी जी उनकी धर्म बहन हैं।

तिवारी जी के अनुसार वह बिलकुल अकेले थे। सरोज की मृत्यु के बाद बहुत सामान्य भी नहीं रह गए थे। उनका पुत्र या कोई अन्य रिश्तेदार कभी उनके पास आता नहीं देखा गया। जब उनकी मृत्यु हुई तब भी कोई परिवार जन नहीं था, दाह संस्कार और क्रियाकर्म मुहल्ले वालों ने ही किया था। उनकी शवयात्रा में अथाह भीड़ थी। कविता से अनजान मनुष्यों को भी अपने निराला से अथाह स्नेह था। उनकी शवयात्रा में लोगों को फूट फूट कर रोते हुए देखा गया था।

एक बिजली के सामान का छोटा दुकानदार, जो भाषा और साहित्य का ज्ञाता नहीं है, हमें इतना निरालामय कर देगा कभी सोचा नहीं था। सुना था किसी दूसरे मुहल्ले में उनके पौत्र-प्रपौत्र भी रहते हैं, पर उनसे मिल कर क्या होता। निराला जी की जीवन यात्रा के गवाह तो दारागंज मुहल्ले के कुछ वयोवृद्ध ही हो सकते थे जिन्होंने उन्हें यह रहते हुए देखा था।
श्री कृष्णकांत तिवारी जी के चरण स्पर्श कर मैं महादेवी को खोजने अशोकनगर की ओर रवाना हुआ।

चित्र और प्रस्तुति : राजेश्वर वशिष्ठ

आभार श्री कृष्णकांत तिवारी जी।

Comments

comments